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राजनीतिक दल और दलबदल कानून (Anti-Defection Law)

भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक दल अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता सीधे शासन नहीं करती, बल्कि अपने प्रतिनिधियों को चुनकर संसद और विधानसभाओं में भेजती है। ये प्रतिनिधि सामान्यतः किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं। राजनीतिक दल नीतियाँ बनाते हैं, चुनाव लड़ते हैं, सरकार बनाते हैं और विपक्ष की भूमिका निभाते हैं।

लेकिन कई बार चुने गए प्रतिनिधि व्यक्तिगत लाभ, पद या अन्य कारणों से अपने दल को छोड़कर दूसरे दल में शामिल हो जाते थे। इस प्रवृत्ति को “दलबदल” कहा जाता है। दलबदल के कारण सरकारें गिर जाती थीं और लोकतांत्रिक स्थिरता प्रभावित होती थी। इसी समस्या से निपटने के लिए भारत में दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) लागू किया गया।


1. राजनीतिक दल का अर्थ और भूमिका

राजनीतिक दल ऐसे संगठित समूह होते हैं जिनके सदस्य समान विचारधारा और नीतियों को मानते हैं तथा सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से चुनाव में भाग लेते हैं।

भारत में प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल सक्रिय हैं। उदाहरण के लिए:

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
  • भारतीय जनता पार्टी
  • बहुजन समाज पार्टी
  • तृणमूल कांग्रेस

राजनीतिक दलों के प्रमुख कार्य:

  1. चुनाव लड़ना और उम्मीदवार खड़ा करना
  2. सरकार बनाना या विपक्ष की भूमिका निभाना
  3. जनमत तैयार करना
  4. नीतियाँ और कार्यक्रम बनाना
  5. जनता और सरकार के बीच सेतु का कार्य करना

राजनीतिक दल लोकतंत्र को संगठित और प्रभावी बनाते हैं। इनके बिना लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की कल्पना करना कठिन है।


2. दलबदल की समस्या

1960 और 1970 के दशक में भारत में दलबदल की घटनाएँ बहुत अधिक बढ़ गई थीं। कई विधायक और सांसद अपने दल छोड़कर अन्य दलों में शामिल हो जाते थे, जिससे सरकारें अस्थिर हो जाती थीं।

हरियाणा में 1967 में एक विधायक ने एक ही दिन में तीन बार दल बदला था। इस घटना के बाद “आया राम, गया राम” शब्द प्रचलित हुआ। इससे स्पष्ट हुआ कि दलबदल लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बन चुका था।

दलबदल के कारण:

  • मंत्री पद का लालच
  • आर्थिक लाभ
  • व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा
  • दल के भीतर असंतोष

इस स्थिति ने लोकतंत्र की स्थिरता और नैतिकता को कमजोर किया।





3. दलबदल विरोधी कानून का प्रारंभ

दलबदल की बढ़ती समस्या को देखते हुए 1985 में संविधान में 52वाँ संशोधन किया गया। इसके अंतर्गत संविधान में दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) जोड़ी गई। यही दलबदल विरोधी कानून का आधार है।

इस कानून का उद्देश्य था:

  • राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना
  • विधायकों और सांसदों को दल बदलने से रोकना
  • लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना

4. दलबदल कानून के प्रमुख प्रावधान

दसवीं अनुसूची के अनुसार निम्न परिस्थितियों में किसी सांसद या विधायक को अयोग्य घोषित किया जा सकता है:


(1) स्वेच्छा से दल की सदस्यता छोड़ना

यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से अपने दल की सदस्यता छोड़ देता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।


(2) पार्टी व्हिप का उल्लंघन

यदि कोई सदस्य पार्टी द्वारा जारी निर्देश (व्हिप) के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है।


(3) निर्दलीय सदस्य का दल में शामिल होना

यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद किसी दल में शामिल हो जाता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।


(4) नामांकित सदस्य का दल बदलना

यदि कोई नामांकित सदस्य छह महीने के भीतर किसी दल में शामिल नहीं होता, तो वह बाद में दल बदलने पर अयोग्य हो सकता है।


5. निर्णय लेने का अधिकार

दलबदल से संबंधित मामलों में अंतिम निर्णय संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति द्वारा लिया जाता है। उदाहरण के लिए:

  • लोकसभा में यह निर्णय लोकसभा के अध्यक्ष द्वारा लिया जाता है।
  • राज्यसभा में सभापति निर्णय लेते हैं।

हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अध्यक्ष का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन हो सकता है।


6. दलबदल कानून में संशोधन

2003 में 91वाँ संविधान संशोधन किया गया। इसके तहत “स्प्लिट” (एक-तिहाई सदस्यों द्वारा अलग समूह बनाना) की छूट समाप्त कर दी गई। अब केवल तभी दलबदल मान्य है जब कम से कम दो-तिहाई सदस्य मिलकर विलय (merger) करें।

इस संशोधन का उद्देश्य दलबदल को और अधिक कठिन बनाना था।


7. दलबदल कानून के लाभ

  • राजनीतिक स्थिरतासरकारें बार-बार गिरने से बचती हैं
  • दल अनुशासनसदस्य पार्टी लाइन का पालन करते हैं।
  • भ्रष्टाचार में कमीपद और धन के लालच में दल बदलने की प्रवृत्ति कम होती है।
  • लोकतंत्र की मजबूतीजनता द्वारा चुने गए जनादेश का सम्मान होता है।

8. दलबदल कानून की आलोचना

हालाँकि यह कानून आवश्यक था, लेकिन इसकी कुछ आलोचनाएँ भी हैं:


(1) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभाव

सांसद या विधायक अपनी व्यक्तिगत राय व्यक्त नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें पार्टी व्हिप का पालन करना होता है।


(2) अध्यक्ष की निष्पक्षता पर प्रश्न

निर्णय लेने का अधिकार अध्यक्ष के पास होता है, जो स्वयं किसी दल से संबंधित होता है। इससे निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।


(3) विलय का दुरुपयोग

कई बार दो-तिहाई सदस्यों के नाम पर सामूहिक दलबदल किया जाता है, जिससे कानून का उद्देश्य कमजोर होता है।

9. वर्तमान संदर्भ में महत्व

हाल के वर्षों में विभिन्न राज्यों में सरकारों के गठन और गिरने की घटनाओं ने दलबदल कानून की प्रासंगिकता को फिर से चर्चा में ला दिया है। राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए यह कानून अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में राजनीतिक स्थिरता विकास के लिए आवश्यक है। दलबदल कानून लोकतंत्र को मजबूत बनाने का प्रयास है, भले ही इसमें कुछ सुधार की आवश्यकता हो।


10. निष्कर्ष

राजनीतिक दल लोकतंत्र के आधार स्तंभ हैं। वे जनता की आकांक्षाओं को नीतियों और कार्यक्रमों के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं। लेकिन जब निर्वाचित प्रतिनिधि व्यक्तिगत लाभ के लिए दल बदलते हैं, तो यह लोकतंत्र की आत्मा को आहत करता है।

दलबदल विरोधी कानून ने इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया है। 1985 में लागू यह कानून भारतीय लोकतंत्र की स्थिरता बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुआ है।

फिर भी, यह आवश्यक है कि इस कानून को और अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाया जाए ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हो सके। राजनीतिक दलों को भी आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करना चाहिए ताकि सदस्यों में असंतोष की स्थिति कम हो।

अंततः, लोकतंत्र की सफलता केवल कानूनों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि राजनीतिक नैतिकता और जन-जागरूकता पर भी निर्भर करती है। जब जनता सजग होगी और प्रतिनिधि ईमानदारी से कार्य करेंगे, तभी लोकतंत्र सशक्त और स्थायी बन सकेगा।

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