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  होम रूल आंदोलन Home Rule Movement (1916)

  भूमिका

   भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में होम रूल आंदोलन (1916) एक महत्वपूर्ण संक्रमणकालीन चरण का प्रतिनिधित्व करता है। यह आंदोलन न तो पूर्ण स्वतंत्रता की माँग करता था और न ही यह केवल संवैधानिक सुधारों तक सीमित था, बल्कि इसने भारत में स्वशासन (Self-Government) की संगठित और स्पष्ट माँग को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया। यह आंदोलन ऐसे समय में शुरू हुआ जब कांग्रेस निष्क्रियता के दौर से गुजर रही थी और जनता में राजनीतिक चेतना को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता थी। बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ यह आंदोलन आगे चलकर गांधी युग के जन आंदोलनों की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

(क) मॉर्ले–मिंटो सुधारों की असफलता (1909)

1909 के सुधार भारतीयों की राजनीतिक आकांक्षाओं को संतुष्ट करने में विफल रहे। सीमित मताधिकार, सांप्रदायिक निर्वाचन और वास्तविक सत्ता का अभाव स्पष्ट हो गया।

(ख) कांग्रेस में विभाजन (1907)

सूरत विभाजन के बाद:

  • नरमपंथी संवैधानिक सुधारों तक सीमित रहे
  • उग्रवादी (तिलक) राजनीतिक मंच से बाहर कर दिए गए
     इससे राष्ट्रीय आंदोलन की गति धीमी पड़ गई

(ग) प्रथम विश्व युद्ध (1914–18)

  • ब्रिटेन युद्ध में उलझा हुआ था
  • भारतीयों को लगा कि युद्धकाल भारत के लिए राजनीतिक रियायतें प्राप्त करने का उचित समय है
  • भारत से भारी आर्थिक व मानव संसाधन की माँग की जा रही थी

(घ) आयरलैंड का प्रभाव

  • आयरलैंड में Home Rule Movement चल रहा था
  • ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर स्वशासन की अवधारणा भारतीय नेताओं को व्यावहारिक लगी

(ङ) तिलक की रिहाई (1914) और एनी बेसेंट का आगमन

  • 1915 में तिलक पुनः सक्रिय राजनीति में लौटे
  • एनी बेसेंट ने भारतीय राजनीति को अंतरराष्ट्रीय मंच से जोड़ा


  होम रूल की अवधारणा

  होम रूल का अर्थ:
         ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत रहते हुए भारत को आंतरिक स्वशासन प्रदान करना

  • यह पूर्ण स्वतंत्रता की माँग नहीं थी
  • भारत को डोमिनियन स्टेटस देने की माँग थी
  • रक्षा, विदेश नीति और संचार ब्रिटेन के पास रहने थे


  होम रूल आंदोलन का संगठनात्मक ढाँचा

(क) बाल गंगाधर तिलक का होम रूल लीग (अप्रैल 1916)

  • मुख्यालय: पुणे
  • कार्यक्षेत्र:
              महाराष्ट्र
              कर्नाटक
              मध्य प्रांत
              बरार
  • प्रचार के माध्यम:

  • गणपति उत्सव
  • शिवाजी उत्सव
  • पत्रिका केसरी

तिलक का नारा:

     “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा”

(ख) एनी बेसेंट का होम रूल लीग (सितंबर 1916)

  • मुख्यालय: मद्रास
  • कार्यक्षेत्र:

                  महाराष्ट्र को छोड़कर शेष भारत
  • पत्रिकाएँ:
                     New India
                     Commonweal
  • प्रमुख सहयोगी:
                        जी.एस. अरोनडेल
                        बी.पी. वाडिया

   दोनों लीग स्वतंत्र थीं लेकिन उद्देश्य समान था




  आंदोलन के उद्देश्य

  • भारत को डोमिनियन स्टेटस प्रदान करना
  • विधान परिषदों का विस्तार और सशक्तिकरण
  • प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • राष्ट्रीय राजनीतिक चेतना का प्रसार
  • कांग्रेस और लीग को सक्रिय मंच बनाना


  आंदोलन की कार्यप्रणाली

होम रूल आंदोलन संवैधानिक और शांतिपूर्ण था:

  • भाषण
  • राजनीतिक शिक्षा
  • पर्चे और पुस्तिकाएँ
  • सार्वजनिक सभाएँ
  • पत्रकारिता के माध्यम से प्रचार

 आंदोलन का उद्देश्य जनता को राजनीतिक रूप से शिक्षित करना था

  कांग्रेस और मुस्लिम लीग के साथ संबंध

लखनऊ समझौता (1916)

  • कांग्रेस और मुस्लिम लीग की संयुक्त माँगें
  • सांप्रदायिक निर्वाचन की स्वीकृति
  • स्वशासन की साझा माँग

  होम रूल आंदोलन ने:

  • राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया
  • नरमपंथी और उग्रवादी नेताओं को एक मंच पर लाया


  ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया

(क) दमनात्मक नीति

  • एनी बेसेंट को जून 1917 में नजरबंद किया गया
  • तिलक के भाषणों पर प्रतिबंध

(ख) जनदबाव और नीति परिवर्तन

  • व्यापक विरोध
  • एनी बेसेंट की रिहाई

(ग) 1917 की ऐतिहासिक घोषणा

ब्रिटिश सरकार (मॉन्टेग्यू) ने कहा:

“भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी शासन की स्थापना ब्रिटिश नीति का लक्ष्य है”

 यह घोषणा होम रूल आंदोलन की प्रत्यक्ष उपलब्धि मानी जाती है


  आंदोलन की सीमाएँ

  • किसान, मजदूर और ग्रामीण जनता की सीमित भागीदारी
  • शिक्षित मध्यम वर्ग तक सीमित
  • कोई स्पष्ट संघर्ष कार्यक्रम नहीं
  • गांधीजी की सक्रिय भूमिका का अभाव
  • प्रथम विश्व युद्ध के बाद आंदोलन की गति धीमी


  आंदोलन का महत्व

(क) वैचारिक महत्व

  • स्वराज की माँग को संगठित स्वरूप
  • स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा

(ख) राजनीतिक महत्व

  • कांग्रेस का पुनर्जीवन
  • उग्रवादी और नरमपंथी एकता
  • 1919 के सुधारों की भूमिका

(ग) ऐतिहासिक महत्व

  • गांधी युग से पूर्व अंतिम संवैधानिक आंदोलन
  • असहयोग आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि
  • भारतीय राजनीति का अंतरराष्ट्रीयकरण


  निष्कर्ष

होम रूल आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का वह चरण था जिसने निष्क्रियता और उग्र जनआंदोलनों के बीच सेतु का कार्य किया। यद्यपि यह आंदोलन जनआधारित नहीं था, फिर भी इसने स्वशासन की माँग को वैचारिक और संगठनात्मक रूप से सुदृढ़ किया। 1917 की ब्रिटिश घोषणा और आगे चलकर गांधीजी के नेतृत्व में जन आंदोलनों का मार्ग प्रशस्त करने में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

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