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 जलवायु विज्ञान (Climatology): अवधारणा, तंत्र एवं समकालीन महत्व


भूमिका

जलवायु विज्ञान भौतिक भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो पृथ्वी के वायुमंडल में दीर्घकाल तक घटित होने वाली मौसमीय अवस्थाओं का अध्ययन करती है। जहाँ मौसम अल्पकालिक वायुमंडलीय स्थिति को दर्शाता है, वहीं जलवायु किसी क्षेत्र में लंबे समय (सामान्यतः 30 वर्ष या अधिक) तक पाई जाने वाली औसत मौसमीय दशाओं का प्रतिनिधित्व करती है। जलवायु मानव जीवन, कृषि, जैव विविधता, आर्थिक गतिविधियों तथा पर्यावरणीय संतुलन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है। इस कारण UPSC परीक्षा में जलवायु विज्ञान का विशेष महत्व है।


जलवायु विज्ञान का अर्थ एवं क्षेत्र

जलवायु विज्ञान वायुमंडलीय तत्वों—जैसे तापमान, वायुदाब, पवन, आर्द्रता एवं वर्षा—के वितरण, उनके अंतर्संबंध और उनके कारणों का वैज्ञानिक अध्ययन है।


जलवायु विज्ञान के प्रमुख अध्ययन क्षेत्र:

  • तापीय संरचना
  • वायुदाब तंत्र
  • पवन प्रणाली
  • वर्षा के प्रकार
  • वैश्विक व क्षेत्रीय जलवायु तंत्र



वायुमंडल की संरचना और जलवायु

पृथ्वी का वायुमंडल विभिन्न गैसों का मिश्रण है, जो जलवायु को नियंत्रित करता है।

वायुमंडल की परतें:

  1. क्षोभमंडल (Troposphere) – सभी मौसमीय घटनाएँ यहीं घटित होती हैं
  2. समतापमंडल – ओजोन परत, UV किरणों से रक्षा
  3. मध्य मंडल
  4. ताप मंडल
  5. बहिर्मंडल
क्षोभमंडल की गतिशीलता ही जलवायु विज्ञान का मूल आधार है।

तापमान और उसका वितरण

तापमान को प्रभावित करने वाले कारक:

  • अक्षांश
  • ऊँचाई
  • स्थल-जल वितरण
  • महासागरीय धाराएँ
  • बादल एवं पवन

तापमान वितरण:

  • भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर तापमान घटता है
  • महाद्वीपीय क्षेत्रों में तापांतर अधिक
  • तटीय क्षेत्रों में तापमान सम रहता है

वायुदाब और पवन तंत्र

वायुदाब

वायुमंडल द्वारा पृथ्वी की सतह पर डाला गया दबाव वायुदाब कहलाता है।

वैश्विक वायुदाब पेटियाँ:

  1. भूमध्य निम्न दाब
  2. उपोष्ण उच्च दाब
  3. उपध्रुवीय निम्न दाब
  4. ध्रुवीय उच्च दाब

पवन तंत्र:

  • स्थायी पवनें: व्यापारिक पवनें, पछुआ पवनें
  • मौसमी पवनें: मानसून
  • स्थानीय पवनें: लू, चिनूक, फोएन

पवन तंत्र ऊष्मा और नमी के स्थानांतरण द्वारा जलवायु को संतुलित करता है।


आर्द्रता और वर्षा

आर्द्रता

वायुमंडल में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं।

वर्षा के प्रकार:

  1. संवहन वर्षा – भूमध्य क्षेत्रों में
  2. पर्वतीय (ओरोग्राफिक) वर्षा – पवनावर्त ढाल पर
  3. चक्रवाती वर्षा – समशीतोष्ण क्षेत्रों में

वर्षा का वितरण कृषि, जल संसाधन और वनस्पति को सीधे प्रभावित करता है।


वैश्विक जलवायु तंत्र

महासागरों की भूमिका

महासागर जलवायु के नियंत्रक हैं:

  • ऊष्मा का भंडारण
  • महासागरीय धाराओं द्वारा ऊष्मा का वितरण

प्रमुख महासागरीय धाराएँ:

  • गल्फ स्ट्रीम
  • कुरोशियो
  • हम्बोल्ट

एल नीनो, ला नीना और ENSO

एल नीनो

प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भाग में समुद्री सतह तापमान का असामान्य वृद्धि।

प्रभाव:

  • भारतीय मानसून कमजोर
  • सूखा
  • वैश्विक मौसमीय असंतुलन

ला नीना

एल नीनो की विपरीत स्थिति, मानसून प्रबल होता है।


मानसून तंत्र (भारतीय संदर्भ)

भारतीय जलवायु मानसूनी प्रकृति की है।

मानसून के कारक:

  • स्थल और जल का तापांतर
  • ITCZ का स्थानांतरण
  • जेट स्ट्रीम
  • तिब्बती पठार

मानसून के चरण:

  1. दक्षिण-पश्चिम मानसून
  2. उत्तर-पूर्व मानसून

मानसून भारत की कृषि, अर्थव्यवस्था और जल सुरक्षा की रीढ़ है।


जलवायु वर्गीकरण

कोपेन का जलवायु वर्गीकरण

तापमान और वर्षा पर आधारित:

  • उष्णकटिबंधीय
  • शुष्क
  • समशीतोष्ण
  • शीत
  • पर्वतीय

जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन

वैश्विक तापन

ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि से पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है।

प्रभाव:

  • हिमनदों का पिघलना
  • समुद्र स्तर वृद्धि
  • चरम मौसम घटनाएँ
  • कृषि संकट

भारत पर प्रभाव:

  • मानसून की अनिश्चितता
  • तटीय क्षेत्रों को खतरा
  • जल संकट

जलवायु विज्ञान का महत्व

  1. कृषि योजना
  2. आपदा प्रबंधन
  3. पर्यावरण संरक्षण
  4. मानव स्वास्थ्य
  5. सतत विकास

निष्कर्ष

जलवायु विज्ञान केवल भौतिक भूगोल का विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व और भविष्य से जुड़ा विज्ञान है। बदलती जलवायु के युग में इसके अध्ययन का महत्व और बढ़ गया है। जलवायु की गहन समझ के बिना न तो सतत विकास संभव है और न ही पर्यावरणीय संकटों का समाधान।

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